Page 62 - NIS Hindi 16-30 June,2023
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राष्ट्    अमृत महोतसव








                          गणेश घोष                                             दवादवा धमवामाधधकवारी
                          अंडमान के सेलयुलर जेल                                दनलतों और मनिलाओं के

                          में नबताए 14 साल                                     उतर्ान में लगाया जीवन


                          जनम : 22 जून 1900, मृतयु : 16 अ्टटूबर 1994           जनम : 18 जून 1899, मृतयु : 1 रदसंबर, 1985


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                 हान  राषट्िादी  गणेश  घोर  का  जनम  बंगाल  प्ात  के   प्  वसधि भारतीय रितत्ता सग्राम सेनानी, गांधीिादी वचंतक
                                                                                         ं
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             मजरसोर वजले के वबंदोपुर गाि में 22 जून 1900 को हुआ      एिं  अनेक  क्ांवतकारी  परतकों  के  लेखक  शंकर  त्रबक
            था। उनका पररिार चटगाि से था, जो अब बांगलादेश में है।   धमा्षवधकारी का जनम 18 जून 1899 को मधय प्देश के बैतूल
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            विद्ाथथी जीिन में ही िे रितत्ता सग्राम में सकममवलत हो गए   वजले  में  हुआ  था।  िह  देश  के  महान  गांधीिादी  नेता  थे  जो
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            थे। गणेश घोर उस क्ांवतकारी समूहों के सदरय थे, वजनहोंन  े  लोगों के बीच दादा धमा्षवधकारी के नाम से विखयात थे। दादा
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            वब्रवटश औपवनिवशक शासन से भारत की रितत्ता हावसल करन  े  धमा्षवधकारी ने अपना अवधकांश समय दवलत और मवहलाओं के
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            के साधनों के रूप में सशरत् विद्ोह का पक् वलया था। अग्रजों   उतथान में लगाया। िह िैचाररक क्ांवत के पक्धर थे। उनकी
            ने मवणकतला बम मामले में घोर को वगरफतार वकया था। इस   मानयता थी वक समाज में पररित्षन के वलए लोगों के विचारों में
            मामले में कोई प्माण नहीं वमल पाने के कारण उनहें कोई सजा तो   पररित्षन आिशयक है।
            नहीं हुई लवकन सरकार ने उनहें करीब तीन िर्ष नजरबंद रखा।  दादा धमा्षवधकारी वहंदी, सरककृत, मराठी, बांगला, गुजराती और
                                                                                       ं
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               जेल से ररहा होने के बाद िे प्वसधि क्ांवतकारी सय्ष सेन के   अग्रजी भारा के अचछे जानकार थे। एक लेखक के रूप में उनकी दो
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            संपक्क में आए और अग्रजों की सत्ा समापत करने के बारे में   दज्षन से अवधक परतकें प्कावशत हुई हैं। िह आजादी के आंदोलन
            सोचने लगे। ऐसे में िह जुगांतर पाटथी में शावमल हो गए और   में लगातार सवक्य बने रहे। जब िे नागपुर में वशक्ा ग्रहण कर
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            सवक्य सदरय बन गए। उनहोंने 18 अप्ल 1930 को सूय्ष सेन   रहे थे, उसी समय महातमा गांधी ने ‘असहयोग आंदोलन’ शुरू
            और अनय क्ांवतकाररयों के साथ चटगाि शरत्ागार छापेमारी में   वकया। उसी दौरान उनहोंने पढाई छोड़ दी। उनहोंने कोई बड़ी वडग्री
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                                                                            े
            भाग वलया। इन क्ांवतकाररयों ने िहां के शारत्गार और टेलीफोन,   नहीं ली थी लवकन रिाधयाय से ही अपने समय के विचारकों में
            तार  रथानों  पर  एक  साथ  आक्मण  कर  वदया।  इनका  इरादा   महतिपण्ष रथान बना वलया था। िे ‘गांधी सिा संघ’ के सवक्य
                                                                                                   े
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            शरत्ागार पर कबजा करना था। इस आक्मण से क्ांवतकाररयों   काय्षकता्ष थे। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की वगरफतारी से छूटने पर ि  े
            को शरत्ागार से शरत् तो वमल गए, पर गोला-बारूद नहीं वमल   मधय प्देश विधानसभा और संविधान परररद के सदरय चुने गए।
            सका। इस बीच गणेश अपने सावथयों से वबछुड़ गए और फ्ासीसी   आचाय्ष वबनोिा भािे के साथ उनका बहुत वनकट का संबंध था
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            बरती चंदननगर चले गए। बाद में पवलस ने उनहें वगरफतार कर   और उनहोंने ‘भूदान आंदोलन’ में भी भाग वलया। पवडत दीनदयाल
            वलया। उनहें कोलकाता लाया गया और मुकदमे के बाद, 1932   उपाधयाय शताबदी समारोह और रिामी वििेकानंद के वशकागो
            में उनहें आजीिन कारािास की सजा हुई।                  में वदए गए भारण की 125िीं िर्षगांठ के अिसर पर छात्ों के
                                                                     े
               सजा के वलए उनहें पोट्ट बलयर की सेलयलर जेल भेज वदया   सममलन में प्धानमंत्ी नरेंद् मोदी ने दादा धमा्षवधकारी को याद
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            गया। िह 14 साल तक इस जेल में बंद रहे। 1946 में जेल स  े  वकया था। उनहोंने कहा था वक महातमा गांधी जो सोचते थे, कहत  े
            छूटने के बाद िे राजनीवत में आ गए। उनहोंने आजादी के बाद भी   थे उसको वय्त करने का काम जीिन के विारा वबनोिा भािे न  े
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            अनेक आंदोलन में भाग वलया। अवतम सांस तक देश सिा के    वकया। वबनोिा जो सोचते थे, उसको शबदों में ढालने का काम
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            वलए समवप्षत रहे। िह 1952, 1957 और 1962 में बेलगवछया   दादा धमा्षवधकारी के वचंतन में वदखता है। साथ ही प्धानमंत्ी मोदी
            से पकशचम बंगाल विधानसभा के वलए चुने गए। 1967 में ि  े  ने उस काय्षक्म में धमा्षवधकारी की एक वकताब में नौकरी मांगन  े
            चौथी लोकसभा के सदरय बने। 16 अ्टूबर 1994 को 94 साल    िाले के मजेदार प्संग का भी वजक् वकया था। वजसमें बताया ह  ै
            की उम्र में गणेश घोर का वनधन हो गया।                 वक वशक्ा ग्रहण कर ली लवकन हुनर नहीं बता पाया नौकरी मांगन  े
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             60 न्यू इंडि्ा समाचार   16-30 जयून 2023
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